June 25, 2026
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रिपोर्ट मंडल ब्यूरो

 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की हवा में आज नवाबियत की खुशबू नहीं, बल्कि अलीगंज में जलकर खाक हुए 15 मासूम बच्चों की साँसों और उनके बेबस माँ-बाप की चीखों का धुआँ तैर रहा है। यह कोई सामान्य हादसा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सरकारी सेटिंग के कसाईखाने में रची गई मरण-कथा है, जहाँ एलडीए के भ्रष्ट तंत्र ने नोटों की गड्डियों के आगे घुटने टेककर देश के भविष्य की बलि चढ़ा दी। पूरा शहर इस वक्त सदमे और गहरी हताशा में काँप रहा है कि हम किस खोखले और बिकाऊ सिस्टम के भरोसे अपने बच्चों को पढ़ने भेज रहे हैं? 2016 का वो खूनी सौदा, जब चंद रुपयों में बच्चों का कफ़न सिया गया, भवन संख्या MS/102/D, सेक्टर-डी, अलीगंज का इतिहास खुद चिल्ला-चिल्लाकर विभाग के भ्रष्टाचार की गवाही दे रहा है।

 

साल 2016 में जब इस अवैध व्यावसायिक इमारत के खिलाफ ध्वस्तीकरण का आदेश जारी हुआ था, तो महज दो महीने के भीतर 5 जुलाई 2016 को उसे किस चमत्कार के तहत निरस्त कर दिया गया? सच तो यह है कि पैसे की हवस में अंधे एलडीए के तत्कालीन विहित अधिकारी ने अवैध को वैध बताकर अपना ईमान बेच दिया था और उसी दिन इन 15 बच्चों का डेथ-वारंट लिख दिया गया था। जब कोई आम नागरिक जनहित में आवाज उठाता है, तो विभाग के जोनल, सहायक, और इंजीनियर मिलकर वीसी साहब के कान भरते हैं कि शिकायतकर्ता की मंशा गलत है! हाँ साहब, शिकायत करने वाले की मंशा तो गलत हो सकती है, लेकिन आपकी कुर्सियों के नीचे जो रिश्वत की गंगा बह रही है, क्या वह गंगाजल है? जब मुख्यमंत्री से लेकर देश के शीर्ष नेतृत्व ने इस कबाड़खाने पर थू-थू की, तो विभागों ने अपनी खाल बचाने के लिए कार्रवाई का वह चिर-परिचित नाटक शुरू कर दिया, जो लखनऊ के लोग हर हादसे के बाद देखते आ रहे हैं। चार अफ़सरों को खूँटे से बाँधकर सस्पेंड कर दिया गया। एलडीए के असिस्टेंट इंजीनियर अनिल कुमार, जूनियर इंजीनियर प्रमोद पांडे, फायर विभाग के कमलेन्द्र कुमार सिंह और ऊर्जा विभाग के गौरव कुमार को वाह साहेब, क्या कड़ा एक्शन लिया है!

जनता मूर्ख नहीं है। यह निलंबन कोई सजा नहीं, बल्कि इन भ्रष्ट मगरमच्छों को कुछ दिनों के लिए जनता के गुस्से से बचाने का सरकारी वीआईपी सेफ़-हाउस है। इस हादसे में जितने दोषी वो बिल्डिंग मालिक हैं, उतने ही विभाग में बैठे अफ़सरों के हाथ भी मासूमों के खून से रंगे हैं। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अब सीधी मांग है कि सिर्फ सस्पेंशन का आईवॉश बंद हो, इन अफ़सरों पर सीधे गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर इन्हें जेल की कालकोठरी में सड़ाया जाए और इनकी अवैध संपत्तियों पर तुरंत बुलडोज़र चलाया जाए। चार सिलेंडर और एनओसी (NOC) का खूनी धंधा, फायर ब्रिगेड वालों का तो कहना ही क्या! इनके लिए सुरक्षा का मतलब सिर्फ इतना है कि दीवार पर मौत के चार सिलेंडर टंगवा दो, छत पर एक पानी की टंकी रखवा दो, और हमारी हथेली गर्म करके एनओसी की पर्ची ले जाओ। इन्हें इस बात से क्या सरोकार कि अगर आग लगी तो बच्चे भागेंगे कहाँ से? बिल्डिंग में कोई एग्जिट डोर नहीं था, क्योंकि एग्जिट डोर बनाने से बिल्डर का कुछ स्क्वायर फीट का मुनाफा कम हो जाता, और अफसरों का कमीशन! वर्तमान समय में कुर्सियों पर जमे वरिष्ठ अधिकारी और अन्य बड़े मगरमच्छों से अब कोई उम्मीद लगाना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों जैसा ही है।

 

चारबाग से लेकर ट्रामा सेंटर तक अवैध निर्माणों की वजह से जो रोज ट्रैफिक का नरक सजता है, उसमें फँसी एम्बुलेंस में जब कोई मरीज दम तोड़ता है, तो वह भी एलडीए द्वारा की गई एक अदृश्य हत्या ही है। मौत के मुहाने पर खड़ा पुराना लखनऊ अगला नंबर किसका? अलीगंज तो फिर भी चौड़ी सड़कों वाला वीआईपी इलाका था, तब भी रेस्क्यू नहीं हो पाया। जरा पुराने शहर के चौक, यहियागंज, अमीनबाद और वजीरगंज जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में झाँक कर देखिए, जहाँ मौत हर मोड़ पर एलडीए की सरपरस्ती में मुस्कुरा रही है। ईश्वर न करे कि कभी वहाँ ऐसी चिंगारी भड़के, क्योंकि वहाँ की संकरी गलियों में तो लाशें निकालने के लिए कफ़न भी कम पड़ जाएंगे। लेकिन एलडीए की जेबें गरम हैं और विभाग आँखें मूँदकर बस अगले बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है।

 

 

क्या इस बार भी जांच कमेटी गठित कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा और फिर से खानापूर्ति का पुराना बाज़ार सजेगा? 15 माताओं की सूनी कोख और लखनऊ की जनता इस बार अपनी औलादों का सौदा भूलने वाली नहीं है। जब तक 2016 की खूनी डील करने वाले मुख्य कातिलों को हथकड़ी नहीं लगती, तब तक यह न्याय सिर्फ एक क्रूर मजाक रहेगा। एलडीए विभाग सवालों के घेरे में 2016 की खूनी डील का विहित अधिकारी कौन था ध्वस्तीकरण का आदेश किसके इशारे पर निरस्त हुआ? बिना पार्किंग की इमारतों के कारण दम तोड़ते मरीजों का कातिल कौन? अवैध को वैध बनाने वाले अफ़सरों के घर बुलडोज़र कब चलेगा? अफ़सरों पर सिर्फ सस्पेंशन क्यों, मर्डर का केस क्यों नहीं? मालिक और अफ़सर दोनों कातिल, तो सजा में भेदभाव क्यों? आवासीय नक्शे पर कमर्शियल बिजली कनेक्शन किसने पास किया? अलीगंज में 15 मौतें, तो चौक-यहियागंज का क्या होगा क्या एलडीए पुराने शहर में किसी बड़े नरसंहार का इंतज़ार कर रहा है?

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