
आफाक अहमद मंसूरी✍🏻
इंसान नहीं, अब मोबाइल चला रहा है ज़िंदगी! क्या आप भी इसके गुलाम बन चुके हैं?
मोबाइल: सुविधा नहीं, धीरे-धीरे बनती घातक लत
एक समय था जब मोबाइल इंसान के हाथ में था। आज हालात ऐसे हैं कि इंसान मोबाइल के कब्ज़े में है। मोबाइल एक ऐसा नशा है जो न दिखाई देता है, न बदबू करता है, न किसी दुकान पर प्रतिबंधित है। लेकिन ये इंसान की ज़िंदगी, रिश्ते, सोच, समय और भविष्य को हर दिन थोड़ा-थोड़ा निगल रहा है। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई स्क्रीन की दुनिया में इस कदर खो चुका है कि मानो मोबाइल के बिना ज़िंदगी का कोई मकसद ही नहीं बचा। एक मिनट के लिए मोबाइल आंखों से ओझल हो जाए तो बेचैनी शुरू हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ छिन गया हो।
इस लत ने सबसे पहले इंसान से उसके अपने छीन लिए। घर-परिवार साथ है, लेकिन बातचीत नहीं। दोस्त पास हैं, लेकिन नज़रें स्क्रीन पर हैं। रिश्तेदार मिलने आते हैं, मगर उनका स्वागत मुस्कान से नहीं, झुकी हुई गर्दन और मोबाइल की स्क्रीन से होता है। सामने बैठा इंसान इंतज़ार करता रह जाता है, और मोबाइल पर चल रही रीलें हंसी बटोरती रहती हैं।
आज रिश्ते दूर हो गए हैं और सोशल मीडिया के अनजान रिश्ते दिल के करीब आ गए हैं। अपनों की आवाज़ कम सुनाई देती है, लेकिन नोटिफिकेशन की छोटी-सी आवाज़ भी तुरंत ध्यान खींच लेती है।
बच्चे किताबों में भविष्य तलाशने के बजाय मोबाइल में ज़िंदगी ढूंढ रहे हैं। बड़े अपने परिवार से ज़्यादा समय स्क्रीन को दे रहे हैं। धीरे-धीरे स्वभाव चिड़चिड़ा हो रहा है, धैर्य खत्म हो रहा है और संवेदनाएं कम होती जा रही हैं।
सबसे दर्दनाक तस्वीर तब दिखाई देती है जब एक ही कमरे में बैठे चार-पांच लोग एक-दूसरे से बात नहीं करते। हर कोई अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त है। हंसी है, लेकिन रीलों पर। खुशी है, लेकिन वर्चुअल दुनिया में, असली ज़िंदगी, असली रिश्ते और असली एहसास कहीं पीछे छूट गए हैं।
मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन उसकी लत ज़रूर खतरनाक है। जब स्क्रीन इंसान पर हावी होने लगे, जब परिवार से ज़्यादा मोबाइल ज़रूरी लगने लगे, जब बच्चों का बचपन और बड़ों का सुकून उसी में कैद हो जाए, तब ये सिर्फ आदत नहीं रहती, बल्कि एक गंभीर सामाजिक बीमारी बन जाती है।
अब सवाल हम सबके सामने है क्या हम मोबाइल के लिए जी रहे हैं या मोबाइल हमारे लिए बना था? क्या कुछ घंटों के लिए स्क्रीन से दूर होकर अपने परिवार, दोस्तों और अपनों के साथ हंसना, बातें करना और ज़िंदगी के खूबसूरत पल जीना इतना मुश्किल हो गया है? अगर इसका जवाब हाँ है, तो ये सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि आने वाले समय की सबसे खतरनाक और लाइलाज सामाजिक बीमारी बनने की चेतावनी है।
अभी भी समय है। मोबाइल का इस्तेमाल करें, लेकिन उसे अपनी ज़िंदगी का मालिक न बनने दें। क्योंकि दुनिया की सबसे खूबसूरत रील मोबाइल में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए असली पलों में होती है |







