

आफाक अहमद मंसूरी✍🏻
लखनऊ | कहा जाता है कि शिक्षा इंसान को बेहतर बनाती है, उसे संस्कार देती है और लोगों के साथ सम्मान से पेश आना सिखाती है। लेकिन आज हालात ऐसे दिखाई देते हैं कि कई सरकारी विभागों में पढ़े-लिखे अधिकारी और कर्मचारी भी आम जनता से ऐसे बात करते हैं, जैसे सामने कोई इंसान नहीं बल्कि उनका नौकर खड़ा हो।
पुलिस थाना हो, तहसील हो, नगर निगम हो, बिजली विभाग हो, सरकारी अस्पताल हो, रेलवे स्टेशन हो या कोई अन्य सरकारी दफ्तर—अक्सर आम लोगों की शिकायत रहती है कि वहां सम्मान से बात नहीं की जाती। जनता अपनी समस्या लेकर जाती है, लेकिन कई जगह उसे समाधान से पहले रूखे व्यवहार, डांट-फटकार, अपमानजनक शब्दों और कभी-कभी गाली-गलौज तक का सामना करना पड़ता है।
सबसे हैरानी की बात ये है कि ये वही लोग हैं जिन्होंने पढ़ाई की, डिग्रियां हासिल कीं, प्रतियोगी परीक्षाएं पास कीं और सरकारी पदों तक पहुंचे। अगर पढ़े-लिखे लोग भी जनता से उसी तरह का व्यवहार करें जैसा एक अशिक्षित और असंस्कारी व्यक्ति करता है, तो फिर शिक्षा और डिग्री का महत्व क्या रह जाता है?
आम आदमी जब किसी सरकारी दफ्तर में जाता है तो वो किसी शौक से नहीं जाता। वो अपनी समस्या, शिकायत या जरूरत लेकर जाता है। उसे उम्मीद होती है कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे सम्मान मिलेगा। लेकिन कई बार उसे ऐसा महसूस कराया जाता है जैसे वो कोई बोझ हो या उसका काम करना किसी पर एहसान हो।
सच्चाई ये है कि सरकारी कर्मचारी जनता के मालिक नहीं, बल्कि जनता के सेवक हैं। उनका वेतन भी जनता द्वारा दिए गए टैक्स से ही आता है। इसलिए जनता से सम्मानपूर्वक बात करना उनका कर्तव्य है, कोई उपकार नहीं।
सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में “जनसेवा” और “उपभोक्ता देवो भवः” लिखा होता है, लेकिन अगर व्यवहार में सम्मान, विनम्रता और संवेदनशीलता नहीं है तो ये शब्द सिर्फ दीवारों की सजावट बनकर रह जाते हैं।
देश में सड़कें, इमारतें और योजनाएं बनाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है लोगों के साथ इंसानों जैसा व्यवहार करना। क्योंकि एक मीठा शब्द वहां काम कर जाता है, जहां बड़ी-बड़ी ताकतें भी असफल हो जाती हैं।
पद बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं बनता, बड़ा वो बनता है जो छोटे से छोटे व्यक्ति को भी सम्मान देता है। सरकारी दफ्तरों में जनता को अधिकार नहीं, सम्मान भी मिलना चाहिए। यही असली जनसेवा है और यही अच्छे शासन की पहचान है। जब तक सरकारी दफ्तरों में भाषा नहीं बदलेगी, तब तक व्यवस्था बदलने के दावे अधूरे ही रहेंगे |






