
भारतीय समाज के इतिहास में यदि किसी स्त्री ने अंधकार को चीरकर शिक्षा की मशाल जलाई, तो वह नाम माता सावित्रीबाई फुले का है। 03 जनवरी 2026 को माली मालाकार मंच, जिला–धनबाद द्वारा उनकी जयंती का आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस विचारधारा को नमन था जिसने सदियों से दबे समाज को उठकर खड़े होने का साहस दिया।
सावित्रीबाई फुले वह नाम हैं, जिन्होंने उस दौर में शिक्षा का दीप जलाया जब बेटियों का स्कूल जाना पाप समझा जाता था। अपमान, तिरस्कार और पत्थरों के बीच भी उन्होंने कलम नहीं छोड़ी, हौसला नहीं तोड़ा। उन्होंने न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका बनने का गौरव प्राप्त किया, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक मौन नहीं, बल्कि सशक्त क्रांति की शुरुआत की।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भावुक स्वर में उनके जीवन संघर्षों को याद किया—कैसे उन्होंने विधवाओं, दलितों और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा और सम्मान का मार्ग प्रशस्त किया। यह आयोजन हमें यह याद दिलाता है कि आज जो अधिकार हमें सहज मिलते हैं, उनके पीछे सावित्रीबाई जैसी महान आत्माओं का बलिदान छिपा है।
आज भी जब समाज में भेदभाव, असमानता और अशिक्षा की जड़ें पूरी तरह नहीं टूटी हैं, तब सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें आईना दिखाता है और प्रेरणा देता है कि परिवर्तन संभव है—यदि इरादे मजबूत हों।
माली मालाकार मंच द्वारा आयोजित यह जयंती समारोह समाज को यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारना है। जब हर बेटी शिक्षित होगी, हर समाज समानता की ओर बढ़ेगा—तभी सावित्रीबाई फुले का सपना साकार होगा।
सावित्रीबाई फुले अमर हैं—विचारों में, संघर्ष में और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदों में।






